निष्काम कर्मयोग की दार्शनिक अवधारणा और आधुनिक प्रासंगिकता : एक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.69919/7scjvt87Keywords:
कर्मयोग, निष्काम कर्म, सकाम कर्म, श्रीमदभगवद गीता, मोक्ष, नैतिकताAbstract
श्रीमद् भगवद्गीता यह केवल धार्मिक ग्रंथ नही है, भारतीय आध्यात्मिक साहित्य का एक अत्यंत अलौकिक और प्रेरणादायक दिव्य ग्रंथ है, जिसमें दार्शनिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक आयामों को कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य, मानव जीवन की उन्नति, जीवन विकास और कर्तव्य का विवेचन किया है । भगवद्गीता की एक विशिष्टता है कि इसमें अर्जुन के विषाद और कर्तव्य-विमूढ़ता के माध्यम से समस्त मानव जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है। जीवन के हर पल आने वाले छोटे बड़े संघर्ष का सहस पुरक सामना करने की शक्ति प्रदान करती है। भगवद्गीता का केंद्रीय सिद्धांत निष्काम कर्मयोग है, जो व्यक्ति को फलासक्ति से मुक्त करके मानसिक शुद्धि, चित्त की स्थिरता, आत्मशुद्धि तथा आत्मोन्नति की दिशा में अग्रेसर करता है। निष्काम कर्मयोग का आशय कभी भी कर्म से पलायन नहीं है , परंतु अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी भी फल की अपेक्षा से करना है । लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ‘गीता रहस्य’ में कर्मयोग को गीता का मूल तत्त्व के रूप मे स्वीकारा और और इसे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार माना । भगवान श्रीकृष्णजी के अनुसार कोई भी प्राणी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, किंतु कर्म को बंधनमुक्त तभी बनाया जा सकता है जब वह आसक्ति से रहित हो। क्योंकि मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर उसका अधिकार नही होता है । आसक्ति से मुक्त रहना, जिससे मनुष्य अपने कर्म बंधन से मुक्त होता है। आसक्ति रहित कर्म का मतलब कर्म का त्याग करना नहीं है, फल की अपेक्षा से स्वयं को मुक्त करना ही त्याग होता है । भगवद्गीता निष्काम कर्म को ही आत्मोन्नति का सर्वश्रेष्ठ साधन कहा है। भगवद्गीता मे कर्म योग को ‘निष्काम कर्म योग’, ‘बुद्धि योग’,और केवल योग के नाम से भी वर्णन किया है। यह शोध-पत्र निष्काम कर्मयोग की दार्शनिक अवधारणा का विश्लेषण करते हुए आधुनिक जीवन की मानसिक, सामाजिक एवं नैतिक समस्याओं के समाधान में इसकी प्रासंगिकता का समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
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