कर्मयोग कर्तव्यबोध का विज्ञान: एक मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि

Authors

DOI:

https://doi.org/10.69919/rd93em59

Keywords:

कर्म, कर्मयोग, कर्तव्य, कर्तव्यबोध, उत्तरदायित्व और योग

Abstract

वर्तमान समाज में अकर्मण्य मानसिकता पुरूषार्थ को अपनी वाणी का आभूषण बनाकर सफलता का श्रेय एवं पारितोषिक फल की महत्वाकांक्षा से ग्रसित है। समाज का एक बड़ा वर्ग कुछ न करने की प्रवृत्ति को अपना स्वभाव एवं स्वाभिमान मान बैठा है। अगर अन्तस् में कुछ करने की प्रेरणा जाग्रत होती है तो वह अपने मूल उत्तरदायित्वों के अतिरिक्त अन्य सब कुछ करने की चेष्ठा करता है। इस प्रकार वर्तमान में अधिकांश व्यक्ति स्वधर्म अथवा स्वकर्म से च्युत् होकर मान, सम्मान, यश, पद, प्रतिष्ठा और गौरव की भूख से पीड़ित है।   

अकर्मण्य होकर तथा दूसरों के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने वाले स्वघोषित साधक, धार्मिक, दर्शनिक एवं नैतिकता का छलावा करने वाले लोगों को प्राण एवं चेतना की दृष्टि देने का कार्य कर्मयोग करता है। कर्मयोग कर्तव्यबोध का अप्रतिम साधन है। कर्मयोग कर्म में समर्पण को जोड़ता है, समर्पण अहंकार को तोड़ता है, अहंकार का अभाव स्वयं से जोड़ता है, स्व से जुड़ा हुआ व्यक्ति स्वयं के कर्तव्य से स्वतः जुड़ जाता है। कर्तव्य का बोध सभी धर्मादि पुरूषार्थ से जोड़ता है तथा एक स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करता है।  

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Published

30-06-2026

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How to Cite

Vishwakarma, A., भाभोर भूपेन्द्रभाई, & पसाया विद्या. (2026). कर्मयोग कर्तव्यबोध का विज्ञान: एक मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि. Divyayatan - A Journal of Lakulish Yoga University, 3(2), 20-22. https://doi.org/10.69919/rd93em59